कविता - डर (नैतिक विचार)

कविता - डर




 डर कामयाबी की सबसे बड़ी बाधा है।

 डर से ही मंजिल दूर सक्सेस आधा है।

 अलग से फीलिंग घुटन खाई जाती है।

 चलते चलते थक फकीर राह न पाती है


अंदर से चूर चुर विश्वास छिड़ हो जाती है ।

हताश मन से डर अपना साम्राज्य जमाती है।

 डर हमारे पैरों को जंजीर बांधे बैठा है ।

ना ऊपर उठने देता एक साए का घेरा है ।


डर से  ही बेरोजगारी घूमते फिरते हैं।

 खुद का हौसला टूटा गवर्नमेंट जॉब ढूंढते फिरते हैं।

डर से ही इंसान सही राह का चयन नहीं कर पाता है।

अपना रास्ता छोड़ बुराई की राह में भटक जाता है।


डर अंदर के शैतान को जगाता है।

मन बेचैन नकरात्मक विचार को बुलाता है।


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