कविता-लालसा


जीवन भर लालसा रह जाती है ।
उम्मीदों की बूंदें  अंत समय तक नहीं बुझ पाती हैं।
ये उम्मीदें शोक का दीवार खड़ा कर देता है।
निराशा का गमन , चिंता मन में जड़ देता है।
लालसा डगर डगर पे घेरा बैठा है।
असंतोष का छाया फेरा बैठा है।
लालसा तन में कूट-कूट के भरा है।
गतिशील मन न होती शान्ति से हरा है।
खाने की लालसा , पहनने की लालसा,
तो कभी महलनुमा घर में रहने की लालसा।
कभी अंत नहीं होती ये  जीवन की अभिलाषा।
कभी अंत नहीं होती ये जीवन की अभिलाषा।
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