कविता - गर्मी के दिन

गर्मी का दिन

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 गर्मी के दिनों में पसीने से भिंगा तन।

थकावट में कमजोर कर गई मन।

 सूरज के बढ़ती ताप से आह कर गई।

 छोटे - छोटे पौधे बिन पानी के मर गई।

 थोड़ी सी हवा आए तो राहत मिल जाए ।

थोड़ा सा भी पत्ता हिल जाए सुकून मिल जाए।

 वर्कर भी इस तेज गर्मी में हैरान हैं।

 ऐसा लग रहा कि इस शरीर की एनर्जी को,

 छीन रहा कोई शैतान है ।

 कोयल की कुहू कुहू आवाज मन को लुभा रही है।

 गर्मी के थकान को मिटा रही है ।

 गन्ना का जूस प्यास बुझा रही है।

पका हुआ आम एनर्जी बढ़ा रही है।

 इस मौसम का फल गर्मी को भगा रही है ।

थोड़ी-थोड़ी गर्मी को कम करा  रही है।

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